समाचारों में बरकरार है पाठकों की रुचि : रिपोर्ट
पत्रकारिता जगत की हालत भले ही खराब हो लेकिन अभी उम्मी कायम रहनी चाहिए। फिलहाल समाचारों में पाठकों की रुचि कम होती नहीं दिख रही है।
न्यूयॉर्क में प्रोजेक्ट फार एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म ने न्यूज मीडिया की स्थिति पर अपनी छठीोर्षिक रिपोर्ट में कहा है कि कई समाचार संगठनों का व्यासायिक ढांचा टूटता नजर आ रहा है लेकिन इस बात के कम ही संकेत हैं कि पाठकों की समाचारों में रुचि कम हो रही है। पिछले कुछ महीनों में चार समाचारपत्र कंपनियों कारण संरक्षण की मांग की और डेनर में राकी माउंटेन ने अपना प्रकाशन बं कर यिा। लेकिन जब ऑनलाइन पाठकों की संख्या की ृष्टि से ेखा गया तोी न्यूयॉर्क टाइम्स औरोशिंगटन पोस्ट के पाठकों की संख्या अब तक र्साधिक पाई गई। प्रोजेक्ट निेशक टाम रोसेंसियल ने यह जानकारीी। रिपोर्ट में बताया गया है कि शीर्ष 50 ऑनलाइन न्यूज ेबसाइटों के पाठकों की संख्या में र्ष 2008 में 27 फीसी का इजाफा हुआ। उन्होंने कहा कि यह उद्योग म नहीं तोड़ रहा है। यह उद्योग आधार से उखड़ने की स्थिति में है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इंटरनेट के अलाा केबल न्यूज एक ऐसा सेक्टर है जो तरक्की कर रहा है और इसका श्रेय राष्ट्रपति चुना को मुख्य रूप से जाता है।
Monday, March 16, 2009
Monday, March 2, 2009
मीडिया और जान पहचान
मीडिया की दुनिया भी अजीब है...बुद्धजीवी लोगों की दुनिया... दूसरों को सीख देनेवालों की दुनियादूसरों को सिखाने वाले क्या ख़ुद सीख पाते हैं ?सिद्धांत और व्यवहार में अन्तर ... दूसरी ओर भाई भतीजा वाद ...मीडिया की दुनिया वही है जहाँ कोई नहीं पूछता आपका ज्ञानबस आपकी हो कोई जान या पहचान।संजीत
मीडिया की दुनिया भी अजीब है...बुद्धजीवी लोगों की दुनिया... दूसरों को सीख देनेवालों की दुनियादूसरों को सिखाने वाले क्या ख़ुद सीख पाते हैं ?सिद्धांत और व्यवहार में अन्तर ... दूसरी ओर भाई भतीजा वाद ...मीडिया की दुनिया वही है जहाँ कोई नहीं पूछता आपका ज्ञानबस आपकी हो कोई जान या पहचान।संजीत
Saturday, February 7, 2009
गरीब की बेटी और भारत
गरीब की बेटी और भारत
मुंबई हमला
लेख का शीर्षक पढ़कर शायद आप हैरत में होंगे कि गरीब की बेटी और भारत में क्या ताल्लुक हो सकता है? अगर हम मुंबई हमलों के बाद के हालातों पर गौर करें तो दोनों में काफी हद समानता है। भारत में जब किसी गरीब की बेटी का बलात्कार होता है, तो न्याय के लिए भटक रहे ‘गरीब बापज् से हर कोई सबूत मांगता है। ‘गरीब बापज् सबूत देता-देता मर जाता है, लेकिन हर बार सबूत कम ही पड़ जाते हैं। और दबंग खुलेआम घूमते रहते हैं। एेसा भारत में अक्सर होता है, लेकिन अब दुनिया में भारत के साथ यही हो रहा है।
मुंबई हमले को लगभग ढाई माह से भी अधिक समय बीत चुका है और भारत अभी तक सबूत पेश कर रहा है। पाकिस्तान को मुंबई पर आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए हर सबूत ‘नाकाफीज् सबूत हो रहा है। अमेरिका सहित पूरी दुनिया यह तो मानती है कि इसमें पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों का हाथ है और वहीं की जमीन का प्रयोग किया गया। लेकिन अमेरिका सहित पूरी दुनिया को यह मंजूर नहीं कि भारत पाकिस्तान के आतंकी शिविरों पर कोई सैन्य कार्रवाई करे।
यहां सवाल उठता है कि क्या भारत उस ‘गरीब बापज् की तरह कमजोर है। इसका जवाब नकारात्मक ही होगा, लेकिन हम हमेशा कमजोर ही क्यों नजर आते हैं। क्यों हमें ही हर बार सबूत देना पड़ता है। क्या वर्ष 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद इराक और अफगानिस्तान पर हमला करने से पहले अमेरिका से किसी ने सबूत मांगा था। आतंकवाद के खिलाफ जंग के नाम पर अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक में सैकड़ों आतंकियों का सफाया कर दिया, वो बात अलग है कि इस ‘जंगज् में लगभग छह लाख आम इराकियों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। अफगानिस्तान में भी बड़ी संख्या में बेगुनाह मारे गए। अफगानिस्तान में अमेरिकी जंग अभी तक जारी है और पाकिस्तान में आतंकी शिविरों पर भी नाटो देशों की सेनाएं हमले कर रही हैं। इस सबके बावजूद अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ दुनिया में किसी ने आवाज उठाने की हिमाकत नहीं की।
वहीं, भारत की तुलना में काफी छोटे माने जाने इजरायल ने फलस्तीन पर हमला करने से पहले किसी को सबूत देने की जरूरत ही नहीं समझी। इजरायल के बारे में तो यह तक कहा जाता है, ‘जब फलस्तीन या गाजा पट्टी की तरफ से एक पत्थर आता है तो इजरायल की तोपें फलस्तीन पर गोले बरसाने लगती हैं।ज् यहां इसका उल्लेख करना भी जरूरी है कि इजरायल अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति काफी सतर्क है। मुंबई हमले के दौरान जब कुछ इजरायली नागरिक आतंकियों के चंगुल में फंसे हुए थे, तब इजरायल ने आतंकवादियों से निबटने के लिए अपने कमांडो भेजने का प्रस्ताव भारत सरकार के पास रखा था। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी किरकिरी होने के डर से भारत ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
लब्बोलुआब यही है कि मुंबई हमले के संबंध में भारत सरकार विदश नीति के स्तर पर अभी तक पूरी तरह विफल साबित हुई है। मुंबई पर हमला करके आतंकवादियों ने भारत की सुरक्षा में छेद किया। तो विदेश नीति के स्तर पर भी भारत की स्थिति ‘फिर वही ढाक के तीन पांतज् वाली रही। मुंबई हमले के ढाई माह बाद भी भारत अभी तक सबूत ही मुहैया करा रहा है। जबकि एक मात्र जिंदा सबूत (आतंकी) आमिल अजमल कसब को पाकिस्तान अपने देश का नागरिक होने से इनकार कर रहा है।
भारत अभी तक सैन्य ताकत के मामले में पाकिस्तान से काफी मजबूत माना जाता रहा है, दुनिया भी इसको हमेशा भी स्वीकार करती आई है। लेकिन मुंबई हमले जसी किसी भी घटना के बाद भारत कमजोर सा ही नजर आता है। भारत की समूची ताकत बेमतलब नजर आती है। इन हालातों में भारत का ‘परमाणु शक्तिज् होने का दावा ‘हाथी के दांतज् की तरह नजर आता है। आखिर हम कब तक दुनिया में इसी तरह ‘kamajor बने रहेंगे।
मुंबई हमला
लेख का शीर्षक पढ़कर शायद आप हैरत में होंगे कि गरीब की बेटी और भारत में क्या ताल्लुक हो सकता है? अगर हम मुंबई हमलों के बाद के हालातों पर गौर करें तो दोनों में काफी हद समानता है। भारत में जब किसी गरीब की बेटी का बलात्कार होता है, तो न्याय के लिए भटक रहे ‘गरीब बापज् से हर कोई सबूत मांगता है। ‘गरीब बापज् सबूत देता-देता मर जाता है, लेकिन हर बार सबूत कम ही पड़ जाते हैं। और दबंग खुलेआम घूमते रहते हैं। एेसा भारत में अक्सर होता है, लेकिन अब दुनिया में भारत के साथ यही हो रहा है।
मुंबई हमले को लगभग ढाई माह से भी अधिक समय बीत चुका है और भारत अभी तक सबूत पेश कर रहा है। पाकिस्तान को मुंबई पर आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए हर सबूत ‘नाकाफीज् सबूत हो रहा है। अमेरिका सहित पूरी दुनिया यह तो मानती है कि इसमें पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों का हाथ है और वहीं की जमीन का प्रयोग किया गया। लेकिन अमेरिका सहित पूरी दुनिया को यह मंजूर नहीं कि भारत पाकिस्तान के आतंकी शिविरों पर कोई सैन्य कार्रवाई करे।
यहां सवाल उठता है कि क्या भारत उस ‘गरीब बापज् की तरह कमजोर है। इसका जवाब नकारात्मक ही होगा, लेकिन हम हमेशा कमजोर ही क्यों नजर आते हैं। क्यों हमें ही हर बार सबूत देना पड़ता है। क्या वर्ष 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद इराक और अफगानिस्तान पर हमला करने से पहले अमेरिका से किसी ने सबूत मांगा था। आतंकवाद के खिलाफ जंग के नाम पर अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक में सैकड़ों आतंकियों का सफाया कर दिया, वो बात अलग है कि इस ‘जंगज् में लगभग छह लाख आम इराकियों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। अफगानिस्तान में भी बड़ी संख्या में बेगुनाह मारे गए। अफगानिस्तान में अमेरिकी जंग अभी तक जारी है और पाकिस्तान में आतंकी शिविरों पर भी नाटो देशों की सेनाएं हमले कर रही हैं। इस सबके बावजूद अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ दुनिया में किसी ने आवाज उठाने की हिमाकत नहीं की।
वहीं, भारत की तुलना में काफी छोटे माने जाने इजरायल ने फलस्तीन पर हमला करने से पहले किसी को सबूत देने की जरूरत ही नहीं समझी। इजरायल के बारे में तो यह तक कहा जाता है, ‘जब फलस्तीन या गाजा पट्टी की तरफ से एक पत्थर आता है तो इजरायल की तोपें फलस्तीन पर गोले बरसाने लगती हैं।ज् यहां इसका उल्लेख करना भी जरूरी है कि इजरायल अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति काफी सतर्क है। मुंबई हमले के दौरान जब कुछ इजरायली नागरिक आतंकियों के चंगुल में फंसे हुए थे, तब इजरायल ने आतंकवादियों से निबटने के लिए अपने कमांडो भेजने का प्रस्ताव भारत सरकार के पास रखा था। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी किरकिरी होने के डर से भारत ने उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
लब्बोलुआब यही है कि मुंबई हमले के संबंध में भारत सरकार विदश नीति के स्तर पर अभी तक पूरी तरह विफल साबित हुई है। मुंबई पर हमला करके आतंकवादियों ने भारत की सुरक्षा में छेद किया। तो विदेश नीति के स्तर पर भी भारत की स्थिति ‘फिर वही ढाक के तीन पांतज् वाली रही। मुंबई हमले के ढाई माह बाद भी भारत अभी तक सबूत ही मुहैया करा रहा है। जबकि एक मात्र जिंदा सबूत (आतंकी) आमिल अजमल कसब को पाकिस्तान अपने देश का नागरिक होने से इनकार कर रहा है।
भारत अभी तक सैन्य ताकत के मामले में पाकिस्तान से काफी मजबूत माना जाता रहा है, दुनिया भी इसको हमेशा भी स्वीकार करती आई है। लेकिन मुंबई हमले जसी किसी भी घटना के बाद भारत कमजोर सा ही नजर आता है। भारत की समूची ताकत बेमतलब नजर आती है। इन हालातों में भारत का ‘परमाणु शक्तिज् होने का दावा ‘हाथी के दांतज् की तरह नजर आता है। आखिर हम कब तक दुनिया में इसी तरह ‘kamajor बने रहेंगे।
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