बिहार के बिहारीपन को बेचने के बाद प्रकाश झा अब उसे खरीदने पहुंच गए हैं। पश्चिमी चंपारण से लोजपा उम्मीदवार झा को भले ही पार्टी ने लालू के साले के विरोध के बावजूद टिकट दिया हो, लेकिन अपहरण, गंगाजल बनाने वाले प्रकाश भी चुनाव जितने के लिए उन्हीं नेताओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं। जब से झा ‘सामाजिक न्याय रथज् पर सवार हुए हैं उन्हें बिहार की संवेदना, उसका पिछड़ापन, गरीबी, अत्याचार नजर नहीं आ रहे हैं। यहां मकसद साफ है। वह सब करने में कोई गुरेज नहीं, जिसका लगातार विरोध करते रहे हैं। सत्ता होती ही ऐसी है। लोगों को अंधा बना देती है। जिनके पास है उसे भी और जो उसकी तलाश में हैं उसे भी।
प्रकाश के कार्यालय पर पुलिस छापे से बरामद दस लाख रुपए उनकी उस साफ स्वच्छ फिल्मी छवि को झूठलाने के लिए काफी है, जिसे पर्दे पर फिल्माकर वह काफी वाहवाही लूट चुके हैं। दरअसल पर्दे का सच, वास्तविक जिंदगी में सच हो यह जरूरी नहीं है। यही कारण है कि देश की गरीबी, मध्यम वर्ग का शोषण और बदहाल जिंदगी को सिनेमा के पर्दे पर बखुबी उतारने वाले कलाकार जब देश की सर्वोच्च संसद में पहुंचते हैं तो उन्हें शायद यह सब दिखाई देना बंद हो जाता है। वह न तो संसद में सवाल पूछते हैं, न ही बैठक में उपस्थित होते हैं। उन्हें गरीबी केवल फिल्मों में ही नजर आता है। अपनी अदाकरी को दमदार बनाने के लिए ये कलाकार भले ही गरीबों के घरों में जाते हों, उनके साथ समय बिताते हों, लेकिन जब उनका भला करने की बात आती है तो उन्हें वह सब नजर नहीं आता है, जिन दिक्कतों से गरीबों को रोजाना रू-ब-रू होना पड़ता है। यह ठीक वैसा ही है जसा राहुल गांधी करते हैं। गरीबों के घर जाते हैं। उन्हें लंबे चौड़े आश्वासन देते हैं और बाद में भूल जाते हैं। उनका उद्धार कोई एनजीओ करता है। चाहे वह कलावती हो या फिर छत्तीसगढ़ और बुंदेलखंड के गांव में बिताई गई रात।
आखिर यह कैसी संवेदना है, जिसे पर्दे पर तो उतारने के लिए पूरी मेहनत की जाती है। यह कहें कि अपने अभिनय से जितनी भी इमानदारी कर सकते हैं, कलाकार करते हैं। क्या इसे कलाकारों की संवेदनहीनता नहीं कहेंगे, जो पर्दे पर तो सब अच्छा करने के दंभ भरते हैं। क्या यह देश के उन हजारों लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं है। उन कलाकारों का जिनका कोई सामाजिक सरोकार नहीं होता है, वह अगर देश की सर्वोच्च संसद में पहुंचते हैं तो उनका वह खोखलापन सामने आ जाता है, जिसे पर पर्दे पर बखुबी निभाते हैं। इस तरह के नेताओं के राजनीति में प्रवेश का लगातार विरोध होता रहा है। लेकिन राजनीतिक दलों की जिताऊ उम्मीदवारों की खोज फिल्मी कलाकारों पर ही जाकर रुकती है। क्योंकि जनता को वास्तविक मुद्दों से दूर रखने के लिए इनके लटके-झटके ज्यादा कारगर होते हैं। हमें सोचना होगा कि आखिर हम उन नेताओं को क्यों चुने, जिन्हे चुनावी मौसम में ही हमारी याद आती है। मौसम खत्म यह भी मेंढक की तरह नदारद हो जाते हैं। चाहे वह अमिताभ हों, गोविंदा हों या फिर कोई और। अब इस कड़ी में कोई प्रकाश झा न जुड़ जाए।
मृगेंद्र पांडेय
Friday, April 24, 2009
Wednesday, April 22, 2009
माया को पीएम बनाओ, देश का बंटाधार करो
सोशल इंजीनियरिंग के बल पर यूपी की सत्ता पर काबिज होने वाली मायावती विदेशी मीडिया को फूटी आंख नहीं सुहाती हैं। भले ही माया सर्वसमाज की बात करने का दावा करें लेकिन विदेशी मीडिया उन्हें समाज में फूट डालने वाली नेता मान रहा है। इतना ही नहीं अब तक कई बार माया के अल्प विदेशी ज्ञान पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। ऐसे में वह किस योग्यता के आधार पर देश के प्रधानमंत्री बनने का दावा कर रही हैं। इतना तो तय है कि माया के पीएम बनने पर देश का बंटाधार होना तय है।
अमेरिकी पत्रिका न्यूजवीक के ताजा अंक में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती को समाज में फूट डालने वाली बड़ी नेता और ‘ओबामा का विलोम बताया है। पत्निका में कहा गया है कि इसमें कोई शक नहीं कि मायावती और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा में कुछ बातें एक समान भी हैं। मायावती भारत में उम्रदराज नेताओं की तुलना में अपेक्षाकृत युवा कही जा सकती हैं और वह अमेरिकी चुनाव से पहले के ओबामा के मुकाबले स्थापित व्यवस्था के लिए कहीं बड़ा खतरा और उनसे कहीं बड़ी ‘छुपी रुस्तमज् साबित हो सकती हैं। पत्रिका ने कहा कि ओबामा ने नस्ल, परम्परागत विचारधारा और अमेरिका में भ्रष्ट हथकंडों से ऊपर उठने वाली राजनीति का वादा किया था जबकि मायावती की ताकत वर्चस्ववादी वर्ग संघर्ष की बुनियाद पर ही टिकी है।
पत्रिका ने विदेश मामलों में मायावती के अल्पज्ञान की ओर भी इशारा किया है। ओबामा की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की बेहतरीन समझ के सामने मायावती कहीं नहीं ठहरतीं। न्यूजवीक का कहना है कि मायावती विदेशी मामलों पर बोलती ही नहीं हैं और जब वे इस बारे में कुछ बोलती भी हैं तो इस कदर अस्पष्ट होती हैं जिसका कोई मतलब नहीं निकाला जा सकता। न्यूजवीक ने पुराने भाषणों और फैसलों के आधार पर मायावती को समाज में फूट डालने वाली नेता बताया है। इसके लिए सरकारी नौकरी में एक हजार अगड़ी जाति के कर्मचारियों के स्थान पर दलितों की नियुक्ति के फैसले का हवाला दिया गया है। इसी तरह दलित आबादी वाले गांवों को अंबेडकर ग्राम घोषित कर इनके विकास को ज्यादा तरजीह देना तथा अगड़ी जातियों वाले गांवों की उपेक्षा का भी उदाहरण दिया गया है। पत्रिका के अनुसार उनके अब तक कार्यकालों में इस तरह के तमाम भेदभावपूर्ण फैसलों के बावजूद उत्तर प्रदेश में दलितों की स्थिति में ना के बराबर सुधार आया है।
अमेरिकी पत्रिका न्यूजवीक के ताजा अंक में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती को समाज में फूट डालने वाली बड़ी नेता और ‘ओबामा का विलोम बताया है। पत्निका में कहा गया है कि इसमें कोई शक नहीं कि मायावती और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा में कुछ बातें एक समान भी हैं। मायावती भारत में उम्रदराज नेताओं की तुलना में अपेक्षाकृत युवा कही जा सकती हैं और वह अमेरिकी चुनाव से पहले के ओबामा के मुकाबले स्थापित व्यवस्था के लिए कहीं बड़ा खतरा और उनसे कहीं बड़ी ‘छुपी रुस्तमज् साबित हो सकती हैं। पत्रिका ने कहा कि ओबामा ने नस्ल, परम्परागत विचारधारा और अमेरिका में भ्रष्ट हथकंडों से ऊपर उठने वाली राजनीति का वादा किया था जबकि मायावती की ताकत वर्चस्ववादी वर्ग संघर्ष की बुनियाद पर ही टिकी है।
पत्रिका ने विदेश मामलों में मायावती के अल्पज्ञान की ओर भी इशारा किया है। ओबामा की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की बेहतरीन समझ के सामने मायावती कहीं नहीं ठहरतीं। न्यूजवीक का कहना है कि मायावती विदेशी मामलों पर बोलती ही नहीं हैं और जब वे इस बारे में कुछ बोलती भी हैं तो इस कदर अस्पष्ट होती हैं जिसका कोई मतलब नहीं निकाला जा सकता। न्यूजवीक ने पुराने भाषणों और फैसलों के आधार पर मायावती को समाज में फूट डालने वाली नेता बताया है। इसके लिए सरकारी नौकरी में एक हजार अगड़ी जाति के कर्मचारियों के स्थान पर दलितों की नियुक्ति के फैसले का हवाला दिया गया है। इसी तरह दलित आबादी वाले गांवों को अंबेडकर ग्राम घोषित कर इनके विकास को ज्यादा तरजीह देना तथा अगड़ी जातियों वाले गांवों की उपेक्षा का भी उदाहरण दिया गया है। पत्रिका के अनुसार उनके अब तक कार्यकालों में इस तरह के तमाम भेदभावपूर्ण फैसलों के बावजूद उत्तर प्रदेश में दलितों की स्थिति में ना के बराबर सुधार आया है।
Thursday, April 16, 2009
अरहर 70, चीनी 32 रुपए किलो और महंगाई 0%!
बाजार में रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम भले ही आसमान छू रहे हैं, लेकिन महंगाई दर शून्य के और करीब पहुंचती जा रही है। जनता महंगाई की मार से बेहाल है और सरकार आंकड़ों के भरोसे अपनी पीठ ठोक रही है।
सरकार भले ही अपने मुंह मियां मिठ्ठू बन ले, लेकिन जनता इसे कैसे भूल सकती है। किसी राजनीतिक दल ने चुनाव में भले ही इसे मुद्दा नहीं बनाया हो, लेकिन जनता वोट देते वक्त इसे जरूर ध्यान में रखेगी।
चार अप्रैल को समाप्त हुए सप्ताह में म्रुास्फीति घटकर 0.18 फीसदी रह गई, इसके उलट फल एवं सब्जियों, दाल, ईंधन और खाद्य तेलों के महंगा होने का क्रम जारी रहा। खाद्य वस्तुओं में फल एवं सब्जियों, अरहर, उड़द, मूंग और चना आलोच्य सप्ताह में महंगे हुए। म्रुास्फीति का पिछले तीन दशकों में यह सबसे न्यूनतम स्तर है।
बहरहाल आंकड़ों में महंगाई का लगातार गिरना और वास्तविकता में खाद्य पदार्थो के दामों का आसमान छूना, जनता के साथ मजाक नहीं तो क्या है।
सरकार भले ही अपने मुंह मियां मिठ्ठू बन ले, लेकिन जनता इसे कैसे भूल सकती है। किसी राजनीतिक दल ने चुनाव में भले ही इसे मुद्दा नहीं बनाया हो, लेकिन जनता वोट देते वक्त इसे जरूर ध्यान में रखेगी।
चार अप्रैल को समाप्त हुए सप्ताह में म्रुास्फीति घटकर 0.18 फीसदी रह गई, इसके उलट फल एवं सब्जियों, दाल, ईंधन और खाद्य तेलों के महंगा होने का क्रम जारी रहा। खाद्य वस्तुओं में फल एवं सब्जियों, अरहर, उड़द, मूंग और चना आलोच्य सप्ताह में महंगे हुए। म्रुास्फीति का पिछले तीन दशकों में यह सबसे न्यूनतम स्तर है।
बहरहाल आंकड़ों में महंगाई का लगातार गिरना और वास्तविकता में खाद्य पदार्थो के दामों का आसमान छूना, जनता के साथ मजाक नहीं तो क्या है।
Thursday, April 2, 2009
Wednesday, March 18, 2009
राजनीति का बेशर्मी से पुराना नाता रहा है
राजनीति की बेशर्मी से सांठगांठ कोई नई बात नहीं है। जैसे-जैसे राजनीति शुरू होती है, बेशर्मी खुद ही धीरे-धीरे प्रवेश करने लगती है। उसका (बेशर्मी) माध्यम राज ठाकरे, बाल ठाकरे, आजम खां जसे कोई भी नेता हो सकते हैं। इस बार माध्यम बने हैं वरुण गांधी। जो देश में काफी सम्मानित गांधी परिवार के ‘सम्मानितज् सदस्य हैं। साथ ही जानवरों के हक में आवाज उठाने वाली मेनका गांधी के पुत्र हैं।
यहां सवाल उठता है कि राजनीति के क्षेत्र में आए दिन होने वाली इस तरह की भड़काऊ बयानबाजी का क्या उद्देश्य है? इसके जवाब के लिए वरुण गांधी की अभी तक की राजनीति और उनके राजनीतिक प्रभाव का अध्ययन करना होगा। वरुण गांधी के पिता संजय गांधी को 1970 से 80 के बीच के समय का काफी तेजतर्रार नेता माना जाता था। वह मारुति की स्थापना के समय विवादित हुए। साथ ही दिल्ली की स्लम बस्तियों की सफाई और नसबंदी कानून को लेकर काफी विवादों और चर्चा में भी रहे। अपने समय में संजय गांधी काफी चर्चित थे तो इमरजेंसी ने उन्हें काफी ताकतवर भी बना दिया था। अगर वरुण गांधी की पिता से तुलना की जाए, तो किसी भी मामले में वह उनके आस-पास भी नहीं दिखाई देते। तुलनात्मक रूप से देश में वह अधिक चर्चा में नहीं हैं। भारतीय जनता पार्टी ने भी उन्हें एक क्षेत्र में सीमित कर दिया है।
ऐसे में वरुण गांधी में निराशा का होना भी स्वाभाविक भी है। इसके विपरीत उनके भाई (तहेरे) राहुल गांधी को हर जगह तवज्जो मिलती है। इसलिए शिखर पर पहुंचने की जल्दी ने शायद वरुण को यह भड़काऊ बयान देने के लिए मजबूर किया हो। बहरहाल, अगर वरुण गांधी ने इस तरह के भड़काऊ बयान दिए हैं, तो वह काफी हद तक अपने उद्देश्य में कामयाब भी हुए हैं। मीडिया में मिली इतनी चर्चा (नकारात्मक) के बाद अब देश भर में उन्हें हर कोई जान गया होगा।
वरुण गांधी के लिए मेरी सलाह है कि संयम से काम लें। शिखर पर पहुंचने के लिए अभी काफी उम्र बाकी है।
Monday, March 16, 2009
पत्रकारिता में सभी उम्मीद खत्म नहीं होनी चाहिए
समाचारों में बरकरार है पाठकों की रुचि : रिपोर्ट
पत्रकारिता जगत की हालत भले ही खराब हो लेकिन अभी उम्मी कायम रहनी चाहिए। फिलहाल समाचारों में पाठकों की रुचि कम होती नहीं दिख रही है।
न्यूयॉर्क में प्रोजेक्ट फार एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म ने न्यूज मीडिया की स्थिति पर अपनी छठीोर्षिक रिपोर्ट में कहा है कि कई समाचार संगठनों का व्यासायिक ढांचा टूटता नजर आ रहा है लेकिन इस बात के कम ही संकेत हैं कि पाठकों की समाचारों में रुचि कम हो रही है। पिछले कुछ महीनों में चार समाचारपत्र कंपनियों कारण संरक्षण की मांग की और डेनर में राकी माउंटेन ने अपना प्रकाशन बं कर यिा। लेकिन जब ऑनलाइन पाठकों की संख्या की ृष्टि से ेखा गया तोी न्यूयॉर्क टाइम्स औरोशिंगटन पोस्ट के पाठकों की संख्या अब तक र्साधिक पाई गई। प्रोजेक्ट निेशक टाम रोसेंसियल ने यह जानकारीी। रिपोर्ट में बताया गया है कि शीर्ष 50 ऑनलाइन न्यूज ेबसाइटों के पाठकों की संख्या में र्ष 2008 में 27 फीसी का इजाफा हुआ। उन्होंने कहा कि यह उद्योग म नहीं तोड़ रहा है। यह उद्योग आधार से उखड़ने की स्थिति में है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इंटरनेट के अलाा केबल न्यूज एक ऐसा सेक्टर है जो तरक्की कर रहा है और इसका श्रेय राष्ट्रपति चुना को मुख्य रूप से जाता है।
पत्रकारिता जगत की हालत भले ही खराब हो लेकिन अभी उम्मी कायम रहनी चाहिए। फिलहाल समाचारों में पाठकों की रुचि कम होती नहीं दिख रही है।
न्यूयॉर्क में प्रोजेक्ट फार एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म ने न्यूज मीडिया की स्थिति पर अपनी छठीोर्षिक रिपोर्ट में कहा है कि कई समाचार संगठनों का व्यासायिक ढांचा टूटता नजर आ रहा है लेकिन इस बात के कम ही संकेत हैं कि पाठकों की समाचारों में रुचि कम हो रही है। पिछले कुछ महीनों में चार समाचारपत्र कंपनियों कारण संरक्षण की मांग की और डेनर में राकी माउंटेन ने अपना प्रकाशन बं कर यिा। लेकिन जब ऑनलाइन पाठकों की संख्या की ृष्टि से ेखा गया तोी न्यूयॉर्क टाइम्स औरोशिंगटन पोस्ट के पाठकों की संख्या अब तक र्साधिक पाई गई। प्रोजेक्ट निेशक टाम रोसेंसियल ने यह जानकारीी। रिपोर्ट में बताया गया है कि शीर्ष 50 ऑनलाइन न्यूज ेबसाइटों के पाठकों की संख्या में र्ष 2008 में 27 फीसी का इजाफा हुआ। उन्होंने कहा कि यह उद्योग म नहीं तोड़ रहा है। यह उद्योग आधार से उखड़ने की स्थिति में है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इंटरनेट के अलाा केबल न्यूज एक ऐसा सेक्टर है जो तरक्की कर रहा है और इसका श्रेय राष्ट्रपति चुना को मुख्य रूप से जाता है।
Monday, March 2, 2009
मीडिया और जान पहचान
मीडिया की दुनिया भी अजीब है...बुद्धजीवी लोगों की दुनिया... दूसरों को सीख देनेवालों की दुनियादूसरों को सिखाने वाले क्या ख़ुद सीख पाते हैं ?सिद्धांत और व्यवहार में अन्तर ... दूसरी ओर भाई भतीजा वाद ...मीडिया की दुनिया वही है जहाँ कोई नहीं पूछता आपका ज्ञानबस आपकी हो कोई जान या पहचान।संजीत
मीडिया की दुनिया भी अजीब है...बुद्धजीवी लोगों की दुनिया... दूसरों को सीख देनेवालों की दुनियादूसरों को सिखाने वाले क्या ख़ुद सीख पाते हैं ?सिद्धांत और व्यवहार में अन्तर ... दूसरी ओर भाई भतीजा वाद ...मीडिया की दुनिया वही है जहाँ कोई नहीं पूछता आपका ज्ञानबस आपकी हो कोई जान या पहचान।संजीत
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